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Monday, 3 August 2020

अज्ञानी संसार में पशु के समान है - मुनि पीयूष

अज्ञानी संसार में बिना सींग और पूछ के पशु के समान होता है।
करनाल,प्रवीण कौशिक
उपप्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मन्दिर से अपने दैनिक सन्देश में कहा कि अज्ञानता को वरदान मानने वालों की भी कोई कमी नहीं है। विश्व में अनेक विचारधाराओं के व्यक्ति पाए जाते हैं। अज्ञानता को प्रश्रय देने वाले अज्ञानवादी कहलाते हैं। संसार में अनेक त्यागी, वैरागी, पण्डित, विद्वान तथा साहित्यकार पाए जाते हैं जो अपने-अपने ढंग से ज्ञान की व्याख्या करते हैं परन्तु उन सबका ज्ञान परस्पर विरोधी होता है। एक मत के आचार्य जो ज्ञान बताते हैं, अन्य मत का आचार्य उसे गलत साबित करते हैं और फलस्वरुप सभी ज्ञान मिथ्या प्रतीत होता हैं। 
इस प्रकार अज्ञानवाद ही सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए प्रत्येक को ज्ञान को पाने के पचड़े में न पड़कर अज्ञान को ही स्वीकार करना चाहिए। ऐसे अज्ञानवादी आगे बढ़कर और कहते हैं कि ज्यों-ज्यों ज्ञान बढ़ता है, त्यों-त्यों दोष भी बढ़ता है जिस कारण जानने वाला अगर कोई अपराध करता है तो उसे दोष लगता है परन्तु न जानते हुए दोष का सेवन करने वाला पाप से मुक्त रहता है परन्तु अज्ञानवादियों के यह सभी कुतर्क गलत साबित होते हैं। प्रथम यदि सभी ज्ञान परस्पर विरोधी होने के कारण गलत है तो अज्ञान भी अयथार्थ ही सिद्ध होता है। बालक एक मूर्ख की तरह अपनी मूर्खता या अज्ञानता को सही मानने का दुराग्रह नहीं करता। अज्ञानता वरदान नहीं बल्कि अभिशाप है। अज्ञानी संसार में बिना सींग और पूछ के पशु के समान होता है।
मुनि जी ने कहा कि अज्ञानी व्यक्ति संसार में सम्मान पाने का अधिकारी नहीं होता। कोई भी समझदार इन्सान मूर्खों के सम्पर्क में रहना पसन्द नहीं करता। मूर्खों की संगति में रहने से व्यक्ति उपहास का पात्र बनता है तथा उसकी गिनती नासमझ लोगों में होने लगती है। तुच्छ बुद्धि वालों के सम्पर्क से व्यक्ति की बुद्धि मन्द हो जाती है। समान श्रेणी वाले मनुष्यों की संगति से बुद्धि ज्यों की त्यों बनी रहती है तथा उच्च विचारों वाले के सम्पर्क से उत्कर्ष को प्राप्त करती है। अज्ञानी को समझना बड़ा कठिन ही नहीं बल्कि असंभव होता है। जिस प्रकार बेल का वृक्ष बादलों के द्वारा अमृत बरसाने पर भी फलता-फूलता नहीं, इसी प्रकार ब्रह्मा के समान योग्य गुरु मिल जाने पर भी मूर्ख व्यक्ति का हृदय चेतता नहीं। मूर्ख को समझाने जाना भैंस के आगे बीन बजाना है। मनुष्य के पास बुद्धि बल से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ  उपलब्धि नहीं है। बुद्धि से ही मनुष्य का मनुष्यत्व प्रकट होता है। बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों की त्रुटियों से सीख लेता है परन्तु नादान कभी-कभी अपनी गलतियों से भी सीख नहीं पाता। बुद्धिमान एक दिन मूर्ख के जीवन भर के बराबर होता है। नादान रहकर लम्बी उम्र पाने की अपेक्षा बुद्धिमान बनकर कम जीना अच्छा होता है। बुद्धि में स्वर्ग का प्रकाश संभव है।

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